Wednesday, March 20, 2019

मानसिक रोगी [Mental illness]

मानसिक रोगी [Mental illness]

मानसिक रोग, कई मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों को संदर्भित करता है - ऐसे विकार जो आपकी मनोदशा, सोच और व्यवहार को प्रभावित करते हैं। मानसिक रोग के उदाहरण हैं - डिप्रेशन (अवसाद), चिंता, स्किज़ोफ़्रेनिया और खाने के विकार।

कई लोगों को समय-समय पर मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं होती हैं लेकिन यह मानसिक बीमारी बन जाती हैं जब इसके लक्षण अक्सर तनाव पैदा करते हैं और कार्य करने की आपकी क्षमता को प्रभावित करते हैं।

एक मानसिक बीमारी आपको बहुत दुखी कर सकती है और अपने दैनिक जीवन में समस्याएं पैदा कर सकती है, जैसे कि स्कूल या काम या रिश्तों में समस्याएं। ज्यादातर मामलों में, लक्षण दवाओं और टॉक थेरेपी (मनोचिकित्सा) के संयोजन के साथ प्रबंधित किये जा सकते हैं।


मानसिक रोग के प्रकार - Types of Mental Illness 

मानसिक रोग कई प्रकार के होते हैं। इसके कुछ प्रकार निम्नलिखित हैं -

1. बाइपोलर डिसआर्डर
2. अल्जाइमर रोग
3. डिमेंशिया (मनोभ्रंश)
4. पार्किंसन रोग
5. आटिज्म
6. डिस्लेक्सिया
7. एडीएचडी
8. डिप्रेशन (अवसाद)
9. तनाव
10. चिंता
11. लत्त सम्बन्धी विकार (और पढ़ें - शराब की लत और नशे   की लत)
12. मनोग्रसित बाध्यता विकार (ओसीडी; OCD)
13. पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रैस डिसऑर्डर (Post Traumatic Stress Disorder)
14. याददाश्त खोना
15. कमजोर याददाश्त
16. भूलने की बीमारी
17. डर (फोबिया)
18. भ्रम (Delusion)
19. मतिभ्रम (Hallucination)


मानसिक रोग के लक्षण - Mental Illness Symptoms 

मानसिक रोग के लक्षण, उसके प्रकार, परिस्थितियों और अन्य कारकों के आधार पर भिन्न हो सकते हैं। मानसिक बीमारी के लक्षण भावनाओं, विचारों और व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं। इसके निम्नलिखित लक्षण होते हैं -

1. उदास महसूस करना।
2. व्याकुल होना या ध्यान केंद्रित करने की क्षमता में कमी।
3. अत्यधिक भय या चिंताएं या अपराध की भावनाएं महसूस करना।
4. मनोदशा में अत्यधिक परिवर्तन।
5. दोस्तों और अन्य गतिविधियों से अलग होना।
6. थकान, कम ऊर्जा या सोने में समस्याएं।
7. वास्तविकता से अलग हटना (भ्रम), पागलपन या मतिभ्रम।
8. दैनिक समस्याओं या तनाव से निपटने में असमर्थता।
9. समस्याओं व लोगों और लोगों के बारे में समझने में समस्या।
10. शराब या नशीली दवाओं का सेवन।
11. खाने की आदतों में बड़े बदलाव।
12. कामेच्छा सम्बन्धी बदलाव।
13. अत्यधिक क्रोध या हिंसक व्यवहार। (और पढ़ें - गुस्सा कम करने के उपाय)
14. आत्मघाती सोच।

कभी-कभी मानसिक स्वास्थ्य विकार के लक्षण जिस्मानी समस्याओं जैसे पेट दर्द, पीठ दर्द, सिरदर्द या अन्य अस्पष्टीकृत दर्द के रूप में दिखाई देते हैं।


मानसिक रोग के कारण - Mental Illness Causes 

मानसिक रोगों के, सामान्य रूप से, विभिन्न आनुवांशिक और पर्यावरणीय कारकों के कारण होने का अनुमान लगाया जाता है। यह कारक निम्नलिखित हैं -

1. अनुवांशिकता
मानसिक रोग उन लोगों में अधिक आम है जिनके रिश्तेदारों को भी मानसिक बीमारी होती है। कुछ अनुवांशिक कारक आपके मानसिक रोग के विकास के जोखिम को बढ़ा सकते हैं और आपकी जिंदगी की स्थिति इसे प्रारंभ कर सकती है।

2. जन्म से पहले कुछ पर्यावरण कारकों का संपर्क
गर्भ में पर्यावरणीय तनाव, उत्तेजनात्मक स्थितियां, विषाक्त पदार्थ, शराब या ड्रग्स के संपर्क में आने से कभी-कभी मानसिक रोग हो सकते हैं।

3. मस्तिष्क का कार्य
न्यूरोट्रांसमीटर स्वाभाविक रूप से मस्तिष्क के रसायनों को आपके मस्तिष्क और शरीर के अन्य हिस्सों में ले जाते हैं। जब इन रसायनों से जुड़े तंत्रिका तंत्र ठीक से काम नहीं करते, तो तंत्रिका रिसेप्टर्स और तंत्रिका तंत्र में परिवर्तन आते हैं जिससे डिप्रेशन (अवसाद) होता है।

कुछ कारक मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के विकास के आपके जोखिम को बढ़ा सकते हैं, जिनमें निम्नलिखित करक शामिल हैं -

माता-पिता या भाई-बहन या किसी अन्य खून के रिश्ते वाले व्यक्ति को मानसिक रोग होना।
किसी तनावपूर्ण जीवन स्थिति, जैसे वित्तीय समस्याएं, किसी की मृत्यु या तलाक का अनुभव करना।

1. कोई पुरानी चिकित्सा समस्या जैसे कि शुगर की बीमारी (डायबिटीज)।
2. गंभीर चोट (दर्दनाक मस्तिष्क की चोट) के परिणामस्वरूप मस्तिष्क की क्षति।
3. दर्दनाक अनुभव, जैसे युद्ध या हमला।
4. शराब या ड्रग्स का प्रयोग।
5. बचपन में दुर्व्यवहार अनुभव करना।
6. केवल कुछ ही दोस्त या स्वस्थ रिश्ते होना।
7. कोई पहले की मानसिक बीमारी।

मानसिक रोग बहुत आम हैं। 5 वयस्कों में से 1 व्यक्ति को कभी न कभी कोई मानसिक बीमारी होती है। मानसिक रोग किसी भी उम्र में शुरू हो सकता है लेकिन अधिकांश यह जीवन के शुरू के वर्षों में शुरू हो जाते हैं।

मानसिक रोग के प्रभाव अस्थायी या स्थायी हो सकते हैं। आपको एक समय में एक से अधिक मानसिक रोग भी हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, आपको डिप्रेशन (अवसाद) और लत्त सम्बन्धी विकार एक ही समय पर हो सकते हैं।


मानसिक रोग से बचाव - Prevention of Mental Illness

मानसिक बीमारी को रोकने का कोई निश्चित तरीका नहीं है। हालांकि, यदि आपको मानसिक बीमारी है, तो तनाव को नियंत्रित करना और आत्मसम्मान को बढ़ाना मदद कर सकते हैं। इसके लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखें -

1. चेतावनी के संकेतों पर ध्यान दें -
अपने चिकित्सक से इस बारे में बात करें कि कोनसी स्थितियां आपके लक्षणों को शुरू कर सकती हैं। एक योजना बनाएं ताकि आपको यह पता चल सके कि लक्षणों को अनुभव करने पर आपको क्या करना है। अगर आपको कोई बदलाव महसूस होते हैं तो अपने चिकित्सक से संपर्क करें। चेतावनी के संकेत देखने के लिए परिवार के सदस्यों या दोस्तों को भी सूचित करें।

2. नियमित चिकित्सा प्राप्त करें -
स्वास्थ्य चिकित्सक के पास जाना न छोड़ें, खासकर यदि आप ठीक महसूस नहीं कर रहे हैं। आपको एक नई स्वास्थ्य समस्या हो सकती है जिसे इलाज की आवश्यकता है या आप दवा के दुष्प्रभावों का अनुभव कर सकते हैं।

3. सहायता प्राप्त करें -
मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति का इलाज करना कठिन हो सकता है यदि आप लक्षणों के खराब होने तक प्रतीक्षा करते हैं। दीर्घकालिक उपचार से लक्षणों को रोकने में मदद मिल सकती है।

4. अपना ध्यान रखें -
पर्याप्त नींद, पौष्टिक आहार और नियमित व्यायाम महत्वपूर्ण हैं। एक नियम बनाए रखने की कोशिश करें। अपने चिकित्सक से बात करें अगर आपको परेशानी हो रही है या यदि आपको आहार और व्यायाम संबंधी कोई प्रशन्न हों।


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Tuesday, March 19, 2019

गामक विकास (Locomotor Development)

गामक या क्रियात्मक विकास (Motor Development)


गामक विकास का अर्थ-: 

गामक विकास का तात्पर्य बालकों में उनकी मांसपेशियों तथा तंत्रिकाओ के समन्वित कार्य द्वारा अपनी शारीरिक क्रियाओं पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त करने होता है। ... हरलाक के अनुसार-"गामक विकास से अभिप्राय है- मांसपेशियों की उन गतिविधियों का नियंत्रण, जो जन्म के समय के पश्चात् निरर्थक एवं अनिश्चित होती है।"

गामक तथा क्रियात्मक विकास का सामान्य अर्थ है –

बच्चे की गामक तथा क्रियात्मक शक्तियों, क्षमताओं तथा योग्यताओं का विकास । क्रियात्मक शक्तियों से अर्थ :ऐसी शारीरिक गतिविधियाँ या क्रियाएँ जिस में बालक को उन क्रियों को करने में माँसपेशियों एवं तन्त्रिकाओं की गतिविधियों के संयोजन की जरूरत होती है – जैसे : चलना, बैठना इत्यादि।

जन्म के बाद बच्चा आंरभ में नासमझ तथा असहाय होता है। वह किसी भी कार्य के लिए आपने माता पिता पर निर्भर रहता है। अबोधता के कारण वह कुध भी कर सकता है। हाथ पैर हिलाना, सिर उठाना, गर्दन घूमना शारीरिक क्रियाए बिना किसी नियंत्रण के करता है। धीरे धीरे उसका विकास होने लगता है और वह अपने अंगों पर नियंत्रण पा लेता है। यही नहीं, उसके शरीर की मांसपेशियां भी सुदृढ़ होने लगती हैं।
इस प्रकार से बच्चे की शारीरिक समर्थता ही क्रियात्मक अथवा गामक विकास कहलाती है।


1. क्रियात्मक विकास बच्चे के स्वस्थ रहने और स्वावलम्बी होने एवं उचित मानसिक विकास में मददत करते है।

2. क्रियात्मक विकास के कारण बच्चे में आत्मविश्वास बढ़ाने में सहायता मिलती है। अगर बालक को पर्याप्त क्रियात्मक विकास नही मिल पाता तो बालक के कौशलों के विकास में रोक लग जाती है।

3. क्रियात्मक विकास के बारे में अध्यापक को पूर्ण ज्ञान होना जरूरी है।

4. इसी ज्ञान से आध्यपक बच्चे में विभिन्न कौशलों का विकास कर सकता है।

5. क्रियात्मक विकास के ज्ञान से शिक्षकों को बच्चों के आयु विशेष या अवस्था या बालक किस आयु में किस प्रकार की कौशलों को अर्जित करने की योग्यता रखता है?

6. जिन बच्चों में क्रियात्मक विकास सामान्य से कम होता है, उनके लिए अध्यापक को विशेष कार्य करने की जरूरत होती है।


मनोवैज्ञानिक ने बच्चे की क्रियात्मक विकास की निम्नलिखित परिभाषाए दी हैं –


1. क्रो एण्ड क्रो के अनुसार – “ गामक अथवा क्रियात्मक योग्यताओं तथा क्षमताओं से तात्पर्य है उन विभिन्न प्रकार की शारीरिक अथवा क्रियाओं से है जिनकें संपादन की कुंजी नाड़ियों और मांसपेशियों की गतिविधियों के संयोजन के हाथ में होती है। “

2. हरलाँक के अनुसार – “ क्रियात्मक विकास वास्तव में बोधात्मक क्रियात्मक विकास है। बच्चे की प्रत्यक्षीकरण की प्रक्रिया तथा शारीरिक नियंत्रण पर गतिविधियों का विकास जो मांसपेशियों तथा नाड़ियों के समन्वय द्वारा संभव है, क्रियात्मक विकास कहलाता है। “

3. डॉ . वर्मा एवं उपाध्याय के अनुसार – “ बालक की क्रियाएं करने की क्षमता के विकास को ही क्रियात्मक विकास कहते है। “

4. जेम्स ड्रेवर के अनुसार – “ क्रियात्मक विकास का सम्बन्ध उन सरंचना और कार्यो से है जो मांसपेशियों की क्रियाओं से सम्बन्धित है अथवा इसका सम्बन्ध जीव की उस प्रतिक्रिया से है जो वह किसी परिस्थिति के प्रति करता है। “ ।

5. कार्ल सी० गेरिसन के अनुसार – “ शक्ति, अंग सामंजस्य तथा गति और हाथ पैर तथा शरीर की अन्य मांसपेशिष्यों के ठीक ठाक उपयोग का विकास उसके पूरे विकास की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। “


गेरिसन के अनुसार गामक तथा क्रियात्मक विकास की प्रवृत्तियां इस प्रकार हैं :

1. शैशव तथा स्कूल पूर्व अवस्था के आरंभिक वर्षों में विकास की गति पर कई कारकों का प्रभाव होता है।

2. धीरे धीरे परिपक्वता आने पर अभ्यास का प्रभाव पड़ने लगता है।

3. प्राथमिक तथा जटिल गति कौशलों में अभ्यास के कारण कुशलता उत्पन्न करती है।

4. कुध गति कौशलों में लड़के, लड़कियों की दक्षता समान होती है। कुछ में अलग अलग होती है।

5. गति कौशल का विकास वृद्धि चक्र के अनुसार होता है।


संक्षेप में हम कह सकते हैं कि गामक अथवा क्रियात्मक विकास का अर्थ गति क्रियाओं के ऐसे क्रमिक विकास से है जिसमें वह अपनी शारीरिक गतिविधियों पर नियंत्रण पाने के लिए लगातर सक्रिय रहता है और प्रगति के मार्ग पर अग्रसर होता है। इस प्रक्रिया में मांसपेशियों का बहुत अधिक योगदान रहता है।

क्रियात्मक विकास का महत्त्व :

क्रियात्मक अथवा गामक विकास का बच्चे के जीवन में अत्याधिक महत्व होता है। यह महत्व प्रत्यक्ष तथा परोक्ष दोनों रूपों में देखा जा सकता है।


1. शारीरिक विकास में सहायक – गामक अथवा क्रियात्मक विकास के कारण बच्चा शारीरिक रूप से विकास करता है और स्वस्थ होता है।

2. मानसिक विकास में सहायक – क्रियात्मक अथवा गामक योग्यताएं और क्षमताए बच्चे के मानसिक विकास में भी सहायता करती हैं जिससे बच्चा शारीरिक तथा मानसिक रूप से स्वस्थ होता है।

3. समाजीकरण के लिए आवश्यक – क्रियात्मक विकास बच्चे के समाजीकरण के लिए आवश्यक है। इससे बच्चा दूसरे बच्चों के साथ रहना सीख जाता है और उनसे बहुत कुध सीखता है।

4. भावनात्मक परिपक्वता के लिए आवश्यक – क्रियात्मक विकास बच्चे की भावनात्मक परिपक्वता में सहायता करता है क्योंकि बच्चे की सफलता तथा विफलता इस बात में निर्भर करती है कि विशेष कार्य में उसकी गतिविधियां किस प्रकार की रही हैं।

5. स्वावलम्बन तथा आत्म निर्भरता में सहायक – क्रियात्मक विकास बच्चे को जहां एक ओर स्वावलम्बन का पाठ पढ़ाता है, वहीं दूसरी ओर उसे आत्मनिर्भर बनने की शिक्षा देता हैै। क्रियात्मक विकास के कारण ही बच्चे स्वालम्बी तथा आत्मनिर्भर बनते हैं। इस द्वाष्टि से गति विकास कदम कदम पर उनकी सहायता करता है।

6. मनोरंजन और आत्मतुष्टि में सहायक – क्रियात्मक अथवा गामक विकास की असंख्य गतिविधियां बच्चों के बाल्यकाल तथा किशोरावस्था में आमोद – प्रमोद की साधन बनती हैं। ये गतिविधियां जहां बच्चों को एक ओर आत्मआनंद तथा आत्म- तृष्टि प्रदान करती है वहां दूसरी ओर उनकी व्यावसायिक कुशलता में भी वृद्धि करती हैं।

7. अध्ययन में सहायक – क्रियात्मक अथवा गामक विकास बच्चों को अध्ययन में भी सहायता प्रदान करता है। अनेक बच्चे गामक विकास के कारण पढ़ाई – लिखाई में अधिक रूचि लेने लगते हैं।

8. स्कूल समायोजन में सहायक – बच्चे के स्कूल समायोजन में भी क्रियात्मक विकास अत्यधिक सहायक है। उदाहरण के रूप में प्रारम्भिक कक्षाओं में लेखन, ड्राईंग तथा चित्रकला पर विशेष बल दिया जाता है। जिन बालक का गति विकास अच्छा होता है वे इन विषयों को अच्छी प्रकार सीख लेते हैं परन्तु जिनका गति विकास पिछड़ा होता है, वे पूर्ण सफलता प्राप्त नहीं कर पाते।

9. आत्मनिर्भर और आत्म विश्वासी बनाने में सहायक – गति विकास के कारण धीरे धोरे बच्चा बड़ा होकर आत्मनिर्भर हो जाता है और उसमे आत्म विश्वास की भावना उत्पन्न होती है और वह दुसरों पर निर्भर न रहकर स्वयं काम करने लगता है।


संक्षेप में हम कह सकते हैं कि गामक विकास की असंख्य गतिविधियां हैं जैसे घूमना, फिरना, कूदना, दौड़ना, पकड़ना, फैंकना, लिखना, पढ़ना आदि। अतः क्रियात्मक विकास जितना अच्छा व अनुकूल होगा, बच्चे में उतनी क्रियाशीलता होगी और वे अपने जीवन में विकास कर सकेंगे ।


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Monday, March 18, 2019

प्रमस्तिष्कीय पक्षाघात के वर्गीकरण

प्रमस्तिष्कीय पक्षाघात के वर्गीकरण

इसे मुख्यतः तीन आधार पर वर्गीकृत किया गया है-

1. तीव्रता के प्रमाण के अनुसार वर्गीकरण

प्रमस्तिष्कीय पक्षाघात का किसी व्यक्ति पर कितना गंभीर प्रभाव है, इसके आधार पर इसे मुख्यतः तीन भागो में वर्गीकृत किया गया है –

क) अल्प प्रमस्तिष्कीय पक्षाघात (Mild Cerebral Palsy) -

इसमें गामक एवं शरीर स्थिति से सम्बंधित विकलांगता न्यूनतम होती है। बच्चा पूरी तरह स्वतंत्र होता है। सीखने में समस्याए हो सकती है। इस श्रेणी के बच्चे सामान्य विद्यालय में सामेकित शिक्षा का लाभ उठा सकते हैं।

ख)अतिअल्प प्रमस्तिष्कीय पक्षाघात (Moderate Cerebral Palsy)-

गामक एवं शरीर स्थिति से सम्बंधित विकलांगता का प्रभाव अधिक होता है। बच्चा उपकरणों की मदद से बहुत हद तक स्वतंत्र हो सकता है। इस श्रेणी के बच्चो के लिए विशेष शिक्षा की आवश्यकता होती है।

ग) गंभीर प्रमस्तिष्कीय पक्षाघात (Severe Cerebral Palsy) -

गामक एवं शरीर स्थिति से सम्बंधित विकलांगता पूर्णतः होती है। बच्चो को दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। इस श्रेणी के बच्चो को अपनी नित्य क्रिया जैसे- कपड़े पहनना, ब्रश करना, स्नान करना, खाना-पीना इत्यादि के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है।

2. प्रभावित अंगो की संख्या के अनुसार वर्गीकरण

शरीर का कौन सा भाग अथवा हाथ-पैर प्रभावित है, इसके आधार पर भी प्रमस्तिष्कीय पक्षाघात का वर्गीकरण किया गया है। प्रभावित अंगो के आधार पर इसे मुख्यतः पांच भागो में वर्गीकृत किया गया है –

क) मोनोप्लेजिया (Monoplegia)-

इस श्रेणी के अंतर्गत आने वाले प्रमस्तिष्कीय पक्षाघात में व्यक्ति का कोई एक हाथ या पैर प्रभावित होता है

ख) हेमीप्लेजिया (Hemiplegia)-

 इसमें एक ही तरफ के हाथ और पैर दोनों प्रभावित होते हैं।

ग) डायप्लेजिया (Diaplegia)-

इसमें ज्यादातर दोनों पैर प्रभावित हो जाते हैं, परन्तु कभी–कभी हाथ में भी इसका प्रभाव दिखता है।

घ) पैराप्लेजिया (Paraplegia)-

इसके अंतर्गत व्यक्ति के दोनों पैर प्रभावित होते हैं।

ङ) क्वाड्रीप्लेजिया (Quadriplegia) -

इसके अंतर्गत दोनों हाथ और दोनों पैर अर्थात शरीर का पूरा भाग प्रभावित रहता है।

3. चिकित्सीय लक्षणों के अनुसार वर्गीकरण

इसके आधार पर प्रमस्तिष्कीय पक्षाघात को चार भागो में बांटा गया है –

क) स्पासटीसिटी (Spasticity) –
इसका अर्थ है कड़ी या तनी हुई माँसपेशी इसमें गामक कुशलता प्राप्त करने में कठिनाई एवं धीमापन महसूस होता है। बच्चें सुस्त दिखते हैं। गति बढ़ने के साथ मांसपेशीय तनाव बढ़ने लगता है। क्रोध या उतेजना की स्थिति में मांसपेशीय कड़ापन और भी बढ़ जाता है। पीठ के बल लेटने पर बच्चे का सर एक तरफ घुमा होता है तथा पैर अंदर की ओर मुड़ जाता है।

ख) एथेटोसिस (Athetosis) –
एथेटोसिस का अर्थ है अनियमित गति। मांसपेशीय तनाव सामान्य होता है। शरीर की गति के साथ तनाव बढ़ता है। बच्चा जब अपनी इच्छा से कोई अंग संचालित करता है तो उसका शरीर तड़फड़ाने लगता है।

ग) एटेक्सिया (Atexia)-
इसका अर्थ है अस्थिर एवं अनियंत्रित गति। इसमें बच्चे का शारीरिक संतुलन ख़राब होता है। ऐसे बच्चें बैठने या खड़े होने पर गिर जाते हैं। इनका मांसपेशीय तनाव कम होता है तथा गमक विकास पिछड़ा होता है।

घ) मिक्स्ड (Mixed) -
स्पासटीसिटी एवं एथेटोसिस अथवा अटेक्सिया में दिखने वाले लक्षण जब किसी बच्चों में मिले हुए दिखते हैं, तो मिश्रित प्रकार के प्रमस्तिष्कीय पक्षाघात से ग्रसित बच्चें कहलाते हैं।

प्रमस्तिष्कीय पक्षाघात के  उपचार

वर्तमान में इस बीमारी की कोई कारगर दवा बनी नहीं है। वर्तमान चिकित्सा एवं उपचार अभी इस रोग और इसके दुष्प्रभाव (साइड इफेक्ट) के बारे में कोई ठोस परिणाम नहीं दे पाए हैं। सेरेब्रल पाल्सी को तीन भागों में बांटकर देखा जा सकता है।

1. पहला स्पास्टिक,

2. दूसरा एटॉक्सिक, और

3. तीसरा एथिऑइड।

स्पास्टिक सेरेब्रल पाल्सी सबसे आम है। लगभग ७० से ८० प्रतिशत मामलों में यही होती है। फिर भी इलाहाबाद के एक डॉ॰ जितेन्द्र कुमार जैन एवं उनकी टीम ने ओएसएससीएस नामक एक थेरैपी से पूर्वोत्तर भारत के एक बच्चे पर प्रयोग पहली बार किया। उनके अनुसार इससे बच्चे न सिर्फ अपने पैरों पर खड़े हो पायेंगे, बल्कि दौड़ भी पायेंगे।

एटॉक्सिक सेरेब्रल पाल्सी की समस्या लगभग दस प्रतिशत लोगों में देखने में आती है। भारत में लगभग २५ लाख बच्चे इस समस्या के शिकार हैं। इस स्थिति में व्यक्ति को लिखने, टंकण (टाइप करने) में समस्या होती है। इसके अलावा इस बीमारी में चलते समय व्यक्ति को संतुलन बनाने में काफी दिक्कत आती है। साथ ही किसी व्यक्ति की दृश्य और श्रवणशक्ति पर भी इसका प्रभाव पड़ता है।

एथिऑइड की समस्या में व्यक्ति को सीधा खड़ा होने, बैठने में परेशानी होती है। साथ ही रोगी किसी चीज को सही तरीके से पकड़ नहीं पाता। उदाहरण के तौर पर वह टूथब्रश, पेंसिल को भी ठीक से इस्तेमाल नहीं कर पाता है।

भौतिक चिकित्सा (फिजियोथिरैपी) द्वारा प्रमस्तिष्क अंगघात की चिकित्सा

इस रोग का इलाज भौतिक चिकित्सा (फिजियोथेरेपी) से पूर्ण रूप से किया जा सकता है। आज के सरकारी अस्पतालो में बच्चो को सेरेब्रल पाल्सी मर्ज लाईलाज कहते हुये इलाज नहीं किया जाता है। कुछ खोज से ज्ञात हुआ भारत में सेरेब्रल पाल्सी रोग से करीब पचिस लाख बच्चे ग्रष्त है।

फिजियोथेरेपि उपचार एवं बोटॅक्स इनजेक्सन के प्रयोग से करीब पंद्रह लाख पुर्ण स्वस्थ एवं पाचँ लाख अत्यधिक प्रतिसद ठिक किये जा सकते है। लेकिन महगे इनजेक्सन एवं सरकारी अस्पतालो में पथभ्रष्ट फिजियोथेरेपिस्टो की वजह से ये बच्चे मौत के मुह में समा जाते है। परिजनो को मर्ज और उपचार से सम्बंन्धीत गलत जानकारी दि जाती है। भौतिक चिकित्सक महीने दो महिने में परिजन को फिजियोथेरेपिस्ट बना के बच्चो को चिकित्सा से दूर कर दिया जाता है। नियमित उपचार की जगह एक दिन के अन्तराल पे एक दिन, एवं हप्ते में एक दिन एवं पुरा फिजियोथेरेपि उपचार परिजन को कराने की सलाह दिया जाता है। फिजियोथेरेपि उपचार पोलियो एवं सेरेब्रल पाल्सी मर्ज से ग्रष्त बच्चो को पुर्ण मिलने की ब्यवस्था हो जाये तो बच्चो को विकलांगता से मुक्ति दिलायी जा सकती है।

अन्तरआत्मा को झकझोर देने वाली यह बात है, कि चिकित्सा पेशे से जुडे लोग चिकित्सा को सिर्फ धन अर्जित करने का साधन बना लिये हैं। मानवता, चिकित्सा धर्म मानवि, संस्कृत इस सम्मानित पेशे से विलुप्त होता जा रहाँ हैं। आर्दशवादी शिक्षीत समाज के लोग चिकित्सक पेसे में मरिज के जान लेने वाली क्रिया और मरिज के दर्द की अनदेखी करने वाले चिकित्सको के अत्यधिक अमानवि कार्य के प्रति संवेदनहीन है। जो दिन ब दिन अत्यधिक पथ भ्रष्ट एवं मानवता से बिहिन होता जा रहा आज का चिकित्सा समाज अप्रत्यक्ष कितने माशुम लोगो के हत्या जैसे सगिन अपराध सल्य चिकित्सा के नाम करता है। आने वाले वक्त में चिकित्सा समाज के वरिष्ठ चिकित्सको ने उठ रही चिकित्सा पेसे के नाम बुराईयो प्रति संवेदनशिलता से ध्यान नहीं दिया गया तो देश का हर दवाखाना, कत्ल खाना के नाम से बुलाया जायेगाँ। जो मानवता संस्कृत चिकित्सक और आर्दशवादी शिक्षित समाज के चेहरे पे बदनुमाँ दाग के रूप में अंकित होगा। यह चिकित्सक मरिज परिजन तिनो के लिए अत्यधिक दुख दायी होगा।


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Sunday, March 17, 2019

प्रमस्तिष्क पक्षाघात [CP]

प्रमस्तिष्क पक्षाघात या सेरेब्रल पाल्सी (Cerebral palsy) 
  
सेरेब्रल का अर्थ मस्तिष्क के दोनो भाग तथा पाल्सी का अर्थ किसी ऐसा विकार या क्षति से है जो शारीरिक गति के नियंत्रण को क्षतिग्रस्त करती है। एक प्रसिद्ध शल्य चिकित्सक विलियम लिटिल ने 1860 ई में बच्चो में पाई जाने वाली असामान्यता से सम्बंधित चिकित्सा की चर्चा की थी जिसमे हाथ एवं पाव की मांसपेशियों में कड़ापन पाया जाता है। ऐसे बच्चों को वस्तु पकड़ने तथा चलने में कठिनाई होती है जिसे लम्बे समय तक लिटिल्स रोग के नाम से जाना जाता था।

अब इसे प्रमस्तिष्कीय पक्षाघात (सेरिब्रल पाल्सी) कहते हैं। 'सेरेब्रल' का अर्थ है मस्तिष्क के दोनों भाग तथा पाल्सी का अर्थ है ऐसी असामान्यता या क्षति जो शारीरिक गति के नियंत्रण को नष्ट करती है प्रमस्तिष्कीय पक्षाघात का अर्थ है मस्तिष्क का लकवा।

यह मस्तिष्कीय क्षति बच्चो के जन्म के पहले, जन्म के समय और जन्म के बाद कभी भी हो सकता है इसमें जितनी ज्यादा मस्तिष्क की क्षति होगी उतनी ही अधिक बच्चो में विकलांगता की गंभीरता बढ़ जाती है।


परिभाषा-

बैटसो एवंं पैरट (1986) के अनुसार "सेरेब्रल पाल्सी एक जटिल, अप्रगतिशील अवस्था है जो जीवन के प्रथम तीन वर्षो मे हुई मस्तिष्कीय क्षति के कारण होती है जिसके फलस्वरूप मांसपेशियों में सामंजस्य न होने के कारण तथा कमजोरी से अपंगता होती है।"

यह एक प्रमस्तिष्क संबंधी विकार है। यह विकार विकसित होते मस्तिष्क के मोटर कंट्रोल सेंटर (संचलन नियंत्रण केन्द्र) में हुई किसी क्षति के कारण होता है। यह बीमारी मुख्यत: गर्भधारण (७५ प्रतिशत), बच्चे के जन्म के समय (लगभग ५ प्रतिशत) और तीन वर्ष तक की आयु के बच्चों को होती है। सेरेब्रल पाल्सी पर अभी शोध चल रहा है, क्योंकि वर्तमान उपलब्ध शोध सिर्फ बाल्य (पीडियाट्रिक) रोगियों पर केन्द्रित है। इस बीमारी की वजह से संचार में समस्या, संवेदना, पूर्व धारणा, वस्तुओं को पहचानना और अन्य व्यवहारिक समस्याएं आती है।


संभावित कारण

इस बीमारी के बारे में पहली बार अंग्रेजी सर्जन विलियम लिटिल ने १८६० में पता लगाया था। इस रोग के मुख्य कारणो में बच्चे के मस्तिष्क के विकास में व्यवधान आने या मस्तिष्क में चोट होते हैं। कुछ अन्य कारण इस प्रकार से हैं।

1. गर्भावस्था के दौरान मां को संक्रमण।

2. मां व बच्चे के रक्त समूह (ब्लड ग्रुप) का न मिलना।

3. मां के गर्भ में बच्चे का अस्वाभाविक अनुवांशिक विकास।

4. नवजात शिशु का पीलिया या अन्य किसी संक्रमण से ग्रस्त होना।


सीपी की शीघ्र पहचान

प्रमस्तिष्कीय पक्षाघात के शीघ्र पहचान के लिए इसके शुरूआती लक्षण को पहचानना अति आवश्यक है क्योंकि जब तक इसके लक्षणों का सही पहचान नहीं होगा तब तक उपचार एवं रोकथाम हेतु कदम उठाना मुश्किल है।

अतः इसके लक्षणों को देखकर शीघ्र पहचान आसानी से की जा सकती है। प्रमस्तिष्कीय पक्षाघात की शीघ्र एवं प्रारंभिक पहचान हेतु निम्नलिखित विन्दुओं के अनुसार बच्चे का आकलन किया जा सकता है –

1) जन्म के समय देर से रोता है या साँस लेता है।
2) जन्म के समय प्रमस्तिष्कीय पक्षाघात युक्त शिशु प्रायः शिथिल या निर्जीव जैसा तथा लचीला एवं पतला होता है। यदि शिशु को छाती की तरफ पकड़कर औंधे मुह लटकाया जाय तो शिशु उल्टा यू (U) जैसा झुक जायेगा।
3) दूसरे सामान्य बच्चे की तुलना में विकास धीमा होता है।
4) गर्दन नियंत्रण एवं बैठने में देर करता है।
5) अपने दोनों हाथो को एक साथ नहीं चलता है तथा एक ही हाथ का प्रयोग करता है।
6) शिशु स्तनपान में असमर्थता दिखाता है।
7) गोद में लेते समय या कपड़ा पहनते समय एवं नहाते समय शिशु का शरीर अकड़ जाता है।
8) शिशु का शरीर बहुत लचीला होता है।
9) बच्चे बहुत उदास दिखते हैं तथा सुस्त गति वाले होते हैं।
10) ओठ से लार टपकता है।


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Saturday, March 16, 2019

ऑटिज्‍म के प्रकार

ऑटिज्‍म के प्रकार

आटिज्म स्पेक्ट्रम विकार के तीन प्रकार हैं -

1. ऑटिस्टिक डिसऑर्डर (क्लासिक ऑटिज्म) (Autistic Disorder)

आटिज्म शब्द सुनते ही अधिकांश लोग इसी प्रकार के आटिज्म के बारे में सोचते हैं। ऑटिस्टिक डिसऑर्डर से ग्रस्त लोग आमतौर पर देरी से बोलते हैं और सामाजिक व संचार की चुनौतियों का सामना करते हैं और असामान्य व्यवहार और रुचियां भी रखते हैं। ऑटिस्टिक डिसऑर्डर वाले कई लोगों को बौद्धिक समस्याएं भी होती हैं।

 2. एस्पर्जर सिन्ड्रोम (Asperger Syndrome)

एस्पर्जर सिंड्रोम से ग्रस्त लोगों को आमतौर पर ऑटिस्टिक डिसऑर्डर के कुछ लक्षण होते हैं। उन्हें सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है और उनकी असामान्य व्यवहार और रुचियां भी हो सकती हैं। हालांकि, उन्हें आमतौर पर भाषा सम्बंधित या बौद्धिक समस्याएं नहीं होती हैं।

3. परवेसिव डेवलपमेंटल विकार (Pervasive Developmental Disorder)

जिन लोगों में ऑटिस्टिक डिसऑर्डर या एस्पर्जर सिंड्रोम के कुछ लक्षण होते हैं उन्हें परवेसिव डेवलपमेंटल विकार हो सकता है। ऐसे लोगों में आमतौर पर ऑटिस्टिक डिसऑर्डर वाले लोगों की तुलना में लक्षण कम होते हैं या उनकी तीव्रता कम होती है। लक्षण केवल सामाजिक और संचार की चुनौतियों का कारण बन सकते हैं।


ऑटिज्‍म के लक्षण

सामाजिक संचार और संपर्क समस्याएं -

1. अपने नाम पर प्रतिक्रिया देने में विफल रहना।

2. गले से लगाने या पकड़ने पर विरोध करना और अकेले खेलना पसंद करना।

3. नज़रें मिलाने से बचना और चेहरे के अभिभावों का न होना।

4. न बोलना या बोलने में देरी करना या पहले ठीक से बोलने वाले शब्द या वाक्यों को न बोल पाना।

5. वार्तालाप को शुरू नहीं कर पाना या जारी नहीं रख पाना या केवल अनुरोध के लिए बातचीत शुरू करना।

6. एक असामान्य लय से बोलना, एक गीत की आवाज़ या रोबोट जैसी आवाज़ का उपयोग करना।

7. शब्दों या वाक्यांशों को दोहराना लेकिन उनके उपयोग की समझ न होना।

8. सरल प्रशनों या दिशाओं को समझने में असमर्थता।

9. अपनी भावनाओं को व्यक्त न करना और दूसरों की भावनाओं से अनजान रहना।

10. निष्क्रिय, आक्रामक या विघटनकारी होने के कारण सामाजिक संपर्क से बचना।


व्यवहार सम्बन्धी लक्षण -

1. कुछ गतिविधियों को दोहराना, जैसे - हिलना, घूमना या हाथ फड़फड़ाना या खुद को नुक्सान पहुंचाने वाली गातीधियाँ (जैसे सिर पटकना)।

2. विशिष्ट दिनचर्या या अनुष्ठान विकसित करना और थोड़े ही बदलाव में परेशान हो जाना।

3. लगातार हिलते रहना।

4. असहयोगी व्यवहार करना या बदलने के लिए प्रतिरोधी होना।

5.समन्वय की समस्याएं या अजीब गतिविधियां करना (जैसे पैर के पंजों पर चलना)।

6. रौशनी, ध्वनि और स्पर्श के प्रति असामान्य रूप से संवेदनशील होना और दर्द महसूस न करना।

7. कृत्रिम खेलों में शामिल न होना।

8. असामान्य तीव्रता या ध्यान लगाकर कोई कार्य या गतिविधि करते रहना।

9. भोजन की अजीब पसंद होना, जैसे कि केवल कुछ खाद्य पदार्थों को खाना या कुछ खास बनावट वाले पदार्थों का ही सेवन करना।

आटिज्‍म के कारण और जोखिम कारक - Autism Causes & Risk Factors 

ऑटिज्म स्पेक्ट्रम विकार का कोई भी ज्ञात कारण नहीं है। विकार की जटिलता और तीव्रता हर किसी में भिन्न होते हैं इसीलिए इसके कई कारण माने जाते हैं। आनुवांशिकी और पर्यावरण कारण दोनों ही आटिज्म में एक महत्व्पूर्ण भूमिका निभाते हैं।

आनुवंशिक समस्याएं

ऑटिज्म स्पेक्ट्रम विकार में कई अलग-अलग जीन शामिल होते हैं। कुछ बच्चों में, आटिज्म किसी आनुवंशिक विकार से सम्बंधित हो सकता है। दूसरों के लिए, आनुवंशिक परिवर्तन बच्चे को ऑटिज्म के प्रति अतिसंवेदनशील बना सकते हैं या पर्यावरणीय जोखिम कारक बना सकते हैं। कुछ आनुवंशिक समस्याएं पारिवारिक होती हैं, जबकि अन्य अपने आप होती हैं।

पर्यावरणीय कारक

शोधकर्ता वर्तमान में यह खोज कर रहे हैं कि क्या वायरल संक्रमण, गर्भावस्था की जटिलताएं या वायु प्रदूषण ऑटिज्म स्पेक्ट्रम विकार की वजह बनते हैं या नहीं।


आटिज्म के जोखिम कारक 

ऑटिज्म स्पेक्ट्रम विकार सभी जातियों और राष्ट्रीयताओं के बच्चों को प्रभावित करता है, लेकिन कुछ कारक इसके जोखिम को बढ़ाते हैं। जैसे -

1. लिंग - लड़कियों के मुकाबले लड़कों को आटिज्म होने की संभावना चार गुना ज़्यादा होती है।

2. परिवार का इतिहास - अगर एक परिवार में कोई बच्चा आटिज्म से ग्रस्त है तो दूसरे बच्चे को भी इससे ग्रस्त होने का अधिक खतरा होता है।

3. अन्य विकार - कुछ मेडिकल समस्याओं वाले बच्चों को आटिज्म के होने का जोखिम अधिक होता है।

4. समय से पहले पैदा हुए बच्चे - 26 सप्ताह से पहले पैदा हुए बच्चों को आटिज्म होने का ज़्यादा खतरा हो सकता है।

5. माता-पिता की आयु - ज़्यादा उम्र के माता-पिता से हुए बच्चे को आटिज्म होने की सम्भावना हो सकती है लेकिन अभी इस विषय पर शोध आवश्यक है।


आटिज्‍म से बचाव - Prevention of Autism 

आटिज्म होने से रोका नहीं जा सकता है लेकिन आप इसके कुछ जोखिम को कम कर सकते हैं यदि आप निम्नलिखित जीवनशैली के परिवर्तनों का प्रयास करते हैं -

1. स्वस्थ रहें - नियमित जाँच करवाएं, अच्छी तरह संतुलित भोजन और व्यायाम करें। सुनिश्चित करें कि आपकी अच्छी जन्मपूर्व देखभाल हुई है और सभी सुझाए गए विटामिन व पूरक आहार लें।

2. गर्भावस्था के दौरान दवाएं न लें - गर्भावस्था में किसी भी प्रकार की दवा लेने से पहले अपने डॉक्टर से पूछें। खासकर दौरों को रोकने वाली दवाएं।

3. शराब न लें - गर्भावस्था के दौरान शराब का सेवन न करें।

4. मौजूदा स्वास्थ्य समस्याओं के लिए उपचार लें - यदि आपको सीलिएक रोग (Celiac Disease) या पीकेयू (PKU; Phenylketonuria) है, तो उसे नियंत्रण में रखने के लिए अपने डॉक्टर की सलाह का पालन करें।

5. टीका लगवाएं  - सुनिश्चित करें कि गर्भवती होने से पहले आपको जर्मन खसरा (German Measles) - जिसे रुबेला (Rubella) भी कहते हैं - का टीका लगाया गया है क्योंकि यह रूबेला-संबंधित आटिज्म को रोक सकता है।


ऑटिज्म का परीक्षण

आटिज्म का निदान करना मुश्किल हो सकता है क्योंकि अन्य विकारों का निदान करने के लिए मौजूद परीक्षणों के जैसे इसके लिए कोई परीक्षण नहीं है। डॉक्टर इसका निदान करने के लिए बच्चे के व्यवहार और विकास को देखते हैं।

आटिज्म का निदान दो चरणों में होता है -

1. विकास संबंधी जांच

2. विस्तृत नैदानिक ​​मूल्यांकन


विकास संबंधी जांच

विकास संबंधी जांच एक छोटी सी परीक्षा होती है, यह बताने के लिए कि क्या बच्चा मूलभूत कौशल सीख रहा है या नहीं। विकास संबंधी जाँच के दौरान डॉक्टर माता-पिता से कुछ प्रशन पूछ सकते हैं या बच्चे के साथ बात करने के लिए कह सकते हैं और यह देख सकते हैं कि वह कैसे सीखते हैं, बोलते हैं, व्यवहार करते हैं और चलते हैं। इनमें से किसी भी क्षेत्र में देरी एक समस्या का संकेत हो सकती है।

यह महत्वपूर्ण है कि डॉक्टर विकास संबंधी विलंब के लिए सभी बच्चों की जाँच करें, लेकिन विशेष रूप से उन बच्चों पर नज़र रखें जिन्हें आटिज्म का  जोखिम ज़्यादा है। यदि चिकित्सक किसी समस्या के लक्षण देखते हैं तो एक विस्तृत नैदानिक ​​मूल्यांकन की आवश्यकता होती है।


विस्तृत नैदानिक मूल्यांकन

निदान का दूसरा चरण एक विस्तृत मूल्यांकन होता है। इसमें बच्चे के व्यवहार और विकास की जाँच की जाती है व माता-पिता से भी सवाल पूछे जा सकते हैं। इसमें सुनवाई और दृष्टि की जाँच, आनुवांशिक परीक्षण, न्यूरोलॉजिकल परीक्षण और अन्य चिकित्सा परीक्षण शामिल हो सकते हैं।

कुछ मामलों में, प्राथमिक देखभाल चिकित्सक आगे मूल्यांकन और निदान के लिए बच्चे को एक विशेषज्ञ के पास ले जाने की सलाह दे सकते हैं। जैसे -

1. बच्चे के विकास और बच्चों में विशेष प्रशिक्षण देने के विशेषज्ञ।

2. मस्तिष्क, रीढ़ और तंत्रिकाओं के विशेषज्ञ।

3. मानव मस्तिष्क के विशेषज्ञ।


आटिज्‍म का इलाज - Autism Treatment 


आटिज्म का कोई इलाज नहीं है। हालांकि, कई तरीकों से सीखने की क्षमता और मानसिक विकास को बढ़ाना संभव है। यह तरीके निम्नलिखित हैं -

व्यवहारिक प्रशिक्षण और प्रबंधन

व्यवहारिक प्रशिक्षण और प्रबंधन व्यवहार व संचार को बेहतर बनाने के लिए सकारात्मक तरीकों, आत्म-सहायता और सामाजिक कौशल प्रशिक्षण का उपयोग करता है। कई प्रकार के उपचार विकसित किए गए हैं, जिनमें एप्लाइड व्यवहार विश्लेषण (applied behaviour analysis), ऑटिस्टिक और संबंधित संचार विकलांग बच्चों का उपचार और शिक्षा शामिल हैं।

विशिष्ट चिकित्सा

इसमें भाषण, व्यावसायिक और शारीरिक उपचार शामिल हैं। ये चिकित्सा आटिज्म के प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण हैं और सभी बच्चों के उपचार में शामिल किये जाने चाहिए। भाषण थेरेपी बच्चों को प्रभावी ढंग से संवाद करने में मदद कर करती है। व्यावसायिक और शारीरिक उपचार समन्वय को बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं। व्यावसायिक उपचार बच्चे को इंद्रियों की सूचनाओं को बेहतर समझ पाने में मदद कर सकता है।

दवाएं

आटिज्म में दवाओं का उपयोग उससे सम्बंधित समस्याओं जैसे डिप्रेशन, चिंता और सक्रियता का इलाज करने के किया जाता है।


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Friday, March 15, 2019

ऑटिज्म के पहचान

पहचान

बाल्यावस्था में सामान्य बच्चों व ऑटिस्टिक बच्चों में कुछ प्रमुख अंतर होते हैं जिनके आधार पर इस अवस्था की पहचान की जा सकती है जैसे कि-

1. सामान्य बच्चे माँ का चेहरा देखते हैं व उसके हाव-भाव को समझने की कोशिश करतें है परन्तु ऑटिज़्म से ग्रसित बच्चे किसी से नज़र मिलाने से कतराते हैं,

2. सामान्य बच्चे आवाजें सुनने से खुश हो जाते हैं परन्तु ऑटिस्टिक बच्चे आवाजों पर ध्यान नहीं देते तथा कभी-कभी बधिर प्रतीत होते हैं,

3. सामान्य बच्चे धीरे-धीरे भाषा-ज्ञान में वृद्वि करते हैं, परन्तु ऑटिस्टिक बच्चे बोलने से कुछ समय बाद अचानक ही बोलना बंद कर देते हैं तथा अजीब आवाजें निकालते हैं,

4. सामान्य बच्चे माँ के दूर होने पर या अनजाने लोगों से मिलने पर परेशान हो जाते हैं परन्तु औटिस्टिक बच्चे किसी के भी आने या जाने से परेशान नहीं होते,

5. ऑटिस्टिक बच्चे तकलीफ के प्रति कोई क्रिया नहीं करते तथा उससे बचने की कोशिश नहीं करते,

6. सामान्य बच्चे करीबी लोगों को पहचानते हैं तथा उनसे मिलने पर मुस्कुरातें है पर ऑटिस्टिक बच्चे कोशिश करने पर भी किसी से बात नहीं करते जैसे अपनी ही किसी दुनिया में खोये रहतें हैं,

7. ऑटिस्टिक बच्चे एक ही वस्तु या कार्य में उलझे रहते हैं तथा अजीब क्रियाओ को बार-बार दोहरातें हैं जैसे ओगे-पीछे हिलना, हाँथ को हिलाते रहना, आदि,

8. ऑटिस्टिक बच्चे अन्य बच्चो की तरह काल्पनिक खेल नहीं खेल पाते वह खेलने की बजाए खिलौनों को सूंघते या चाटतें हैं,

9. ऑटिस्टिक बच्चे बदलाव को बर्दाशत नहीं कर पाते व अपने क्रियाकलापों को नियमानुसार ही करना चाहतें हैं

10. ऑटिस्टिक बच्चे या तो बहुत चंचल या बहुत सुस्त रहते हैं,

11. इन बच्चो में अधिकतर कुछ विशेष बातें होती हैं जैसे किसी एक इन्द्री (जैसे, श्रवण शक्ति) का अतितीव्र होना।


दोहराव युक्त व्यवहार

1. स्टीरेओटाईपी एक निरर्थक प्रतिक्रिया है, जैसे हाथ हिलाना, सिर घुमाना या शरीर को झकझोरना आदि।

2. बाध्यकारी व्यवहार का उद्देश्य नियमों का पालन करना होता है, जैसे कि वस्तुओं को एक निश्चित तरह की व्यवस्था में रखना।

3. समानता का अर्थ परिवर्तन का प्रतिरोध है, उदाहरण के लिए, फर्नीचर के स्थानांतरण से इंकार।

4. अनुष्ठानिक व्यवहार के प्रदर्शन में शामिल हैं दैनिक गतिविधियों को हर बार एक ही तरह से करना, जैसे एक सा खाना, एक सी पोशाक आदि। यह समानता के साथ निकटता से जुडा है और एक स्वतंत्र सत्यापन दोनो के संयोजन की सलाह देता है।

5. प्रतिबंधित व्यवहार ध्यान, शौक या गतिविधि को सीमित रखने से संबधित है, जैसे एक ही टीवी कार्यक्रम को बार बार देखना।

6. आत्मघात (स्वयं को चोट पहुँचाना) से अभिप्राय है कि कोई भी ऐसी क्रिया जिससे व्यक्ति खुद को आहत कर सकता हो, जैसे खुद को काट लेना। डोमिनिक एट अल के अनुसार लगभग ASD से प्रभावित 30 % बच्चे स्वयं को चोट पहँचा सकते हैं।

 कोई एक खास दोहराव आत्मविमोह से संबधित नहीं है, लेकिन आत्मविमोह इन व्यवहारों के लिये उत्तरदायी है।


ऑटिज़्म के चिकित्सा

ऑटिज़्म को शीघ्र पहचानना और मनोरोग विशेषज्ञ से तुरंत परामर्श ही इसका सबसे पहला इलाज है। ऑटिज़्म के लक्ष्ण दिखने पर मनोचिकित्सक, मनोवैज्ञानिक, या प्रशिक्षित स्पेशल एजुकेटर (विशेष अध्यापक) से सम्पर्क करें। ऑटिज़्म एक आजीवन रहने वाली अवस्था है जिसके पूर्ण उपचार के लिए कोई दवा की खोज ज़ारी है, अतः इसके इलाज के लिए यहाँ-वहाँ न भटकें व बिना समय गवाएं इसके बारे में जानकारी प्राप्त करें।

ऑटिज़्म एक प्रकार की विकास सम्बंघित बीमारी है जिसे पूरी तरह तो ठीक नहीं किया जा सकता, परन्तु सही प्रशिक्षण व परामर्श के द्वारा रोगी को बहुत कुछ सिखाया जा सकता है, जो उसे अपने रोज के जीवन में अपनी देखरेख करने में मदद करता है।

ऑटिज़्म से ग्रसित 70% वयक्तियों में मानसिक मन्दता पायी जाती है जिसके कारण वह एक सामान्य जीवन जीने में पूरी तरह से समर्थ नहीं हो पाते, परन्तु यदि मानसिक मन्दता बहुत अघिक न हो तो ऑटिज़्म से ग्रसित व्यक्ति बहुत कुछ सीख पाता है। कभी-कभी इन बच्चों में कुछ ऐसी काबिलियत भी देखी जाती हैं जो सामान्य वयक्तियों की समझ व पहुच से दूर होती हैं।

ऑटिज़्म से ग्रसित बच्चे को निम्नलिखित तरीकों से मदद दी जा सकती है-[2]


इन्द्रियों को सम्मिलित करना

1. शरीर पर दबाव बनाने के लिए बड़ी गेंद का इस्तेमाल करें,

2. सुनने की अतिशक्ति को कम करने के लिए कान पर थोड़ी देर के लिए हल्की मालिश करें!


खेल व्यवहार के लिए

1. खेल-खेल में नए शब्दों का प्रयोग करें,

2. खिलौनों के साथ खेलने का सही तरीका दिखाएँ,

3. बारी-बारी से खेलने की आदत डालें,

4. धीरे-धीरे खेल में लोगो की संख्या को बढ़ते जायें।


बोल-चाल के लिए

1. छोटे-छोटे वाक्यों में बात करें,

2. साधारण भाषा का प्रयोग करें,

3. रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाले शब्दो को जोड़ कर बोलना सिखांए,

4. पहले समझना तथा फिर बोलना सिखांए,

5. यदि बच्चा बोल पा रहा है तो उसे शाबाशी दें तथा बार-बार बोलने के लिए प्रेरित करें,

6. बच्चे को अपनी जरूरतों को बोलने का मौका दें,

7. यदि बच्चा बिल्कुल बोल नहीं पाए तो उसे तस्वीर की तरफ़ इशारा करके अपनी जरूरतों के बारे में बोलना सिखाएं।


मेल-जोल के लिए

1. बच्चे को घर के अलावा अन्य लोगों से नियमित रूप से मिलने का मौका दें,

2. बच्चे को तनाव मुक्त स्थानों जैसे पार्क आदि में ले कर जायें,

3. अन्य लोगों को बच्चे से बात करने के लिए प्रेरित करें,

4. बच्चे के साथ धीरे-धीरे कम समय से बढ़ाते हुए अधिक समय के लिए नज़र मिला कर बात करने की कोशिश करे,

5. तथा उसके किसी भी प्रयत्न को प्रोत्साहित करना न भूलें।


व्यवहारिक परेशानियों के लिए

यदि बच्चा कोई एक व्यवहार बार-बार करता है तो उसे रोकने के लिए उसे कुछ ऐसी गतिविधियों में लगाएं जो उसे व्यस्त रखें ताकि वे व्यवहार दोहरा न सके,

1. गलत व्यवहार दोहराने पर बच्चे को कुछ ऐसा काम करवांए जो उसे पसंद नहीं है,

2. यदि बच्चा कुछ देर गलत व्यवहार न करे तो उसे तुरंत प्रोत्साहित करें,

3. प्रोत्साहन के लिए रंग-बिरंगी, चमकीली तथा ध्यान खीचनें वाली चीजों का इस्तेमाल करें!


गुस्सा या अधिक चंचलता के लिए

1. बच्चे को अपनी शक्ति को इस्तेमाल करने के लिए सही मार्ग दिखाएँ जैसे की उसे तेज व्यायाम, दौड़, तथा बाहरी खेलों में लगाएं,

2. यदि परेशानी अधिक हो तो मनोचिकित्सक के द्वारा दी गई दवा का उपयोग भी किया जा सकता है।

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Thursday, March 14, 2019

स्वलीनता (ऑटिज़्म)(ASD)

Autism spectrum disorder (ASD)

स्वलीनता (ऑटिज़्म) मस्तिष्क के विकास के दौरान होने वाला विकार है जो व्यक्ति के सामाजिक व्यवहार और संपर्क को प्रभावित करता है। हिन्दी में इसे 'आत्मविमोह' और 'स्वपरायणता' भी कहते हैं। इससे प्रभावित व्यक्ति, सीमित और दोहराव युक्त व्यवहार करता है जैसे एक ही काम को बार-बार दोहराना। यह सब बच्चे के तीन साल होने से पहले ही शुरु हो जाता है।[1] इन लक्षणों का समुच्चय (सेट) आत्मविमोह को हल्के (कम प्रभावी) आत्मविमोह स्पेक्ट्रम विकार (ASD) से अलग करता है, जैसे एस्पर्जर सिंड्रोम।

ऑटिज़्म एक मानसिक रोग है जिसके लक्षण जन्म से ही या बाल्यावस्था से नज़र आने लगतें हैं। जिन बच्चो में यह रोग होता है उनका विकास अन्य बच्चो की अपेक्षा असामान्य होता है।


ऑटिज़्म के कारण

ऑटिज़्म होने के कोई एक कारण नहीं खोजा जा सका है। अनुशोधों के अनुसार ऑटिज़्म होने के कई कारण हो सकते हैं जैसे-
1. मस्तिष्क की गतिविधियों में असामान्यता होना,
2. मस्तिष्क के रसायनों में असामान्यता,
3. जन्म से पहले बच्चे का विकास सही रूप से न हो पाना आदि।

आत्मविमोह का एक मजबूत आनुवंशिक आधार होता है, हालांकि आत्मविमोह की आनुवंशिकी जटिल है और यह स्पष्ट नहीं है कि ASD का कारण बहुजीन संवाद (multigene interactions) है या दुर्लभ उत्परिवर्तन (म्यूटेशन)। दुर्लभ मामलों में, आत्मविमोह को उन कारकों से भी जोडा गया है जो जन्म संबंधी दोषों के लिये उत्तरदायी है।

अन्य प्रस्तावित कारणों मे, बचपन के टीके, विवादास्पद हैं और इसके कोई वैज्ञानिक सबूत भी नहीं है। हाल की एक समीक्षा के अनुमान के मुताबिक प्रति 1000 लोगों के पीछे दो मामले आत्मविमोह के होते हैं, जबकि से संख्या ASD के लिये 6/1000 के करीब है। औसतन ASD का पुरुष:महिला अनुपात 4,3:1 है। 1980 से आत्मविमोह के मामलों में नाटकीय ढंग से वृद्धि हुई है जिसका एक कारण चिकित्सीय निदान के क्षेत्र में हुआ विकास है लेकिन क्या असल में ये मामले बढे़ है यह एक उनुत्तरित प्रश्न है।

आत्मविमोह मस्तिष्क के कई भागों को प्रभावित करता है, पर इसके कारणों को ढंग से नहीं समझा जाता। आमतौर पर माता पिता अपने बच्चे के जीवन के पहले दो वर्षों में ही इसके लक्षणों को भाँप लेते हैं।

शुरुआती संज्ञानात्मक या व्यवहारी हस्तक्षेप, बच्चों को स्वयं की देखभाल, सामाजिक और बातचीत कौशल के विकास में सहायता कर सकते हैं। इसका कोई इलाज नहीं है। बहुत कम आटिस्टिक बच्चे ही वयस्क होने पर आत्मनिर्भर होने में सफल हो पाते हैं। आजकल एक आत्मविमोही संस्कृति विकसित हो गयी है, जिसमे कुछ लोगों को इलाज पर विश्वास है और कुछ लोगों के लिये आत्मविमोह एक विकार होने के बजाय एक स्थिति है।



ऑटिज़्म के लक्षण

आत्मविमोह को एक लक्षण के बजाय एक विशिष्ट लक्षणों के समूह द्वारा बेहतर समझा जा सकता है। मुख्य लक्षणों में शामिल हैं सामाजिक संपर्क में असमर्थता, बातचीत करने में असमर्थता, सीमित शौक और दोहराव युक्त व्यवहार है। अन्य पहलुओं मे, जैसे खाने का अजीब तरीका हालाँकि आम है लेकिन निदान के लिए आवश्यक नहीं है।

सामाजिक विकास आत्मविमोह के शिकार मनुष्य सामाजिक व्यवहार में असमर्थ होने के साथ ही दूसरे लोगों के मंतव्यों को समझने में भी असमर्थ होते हैं इस कारण लोग अक्सर इन्हें गंभीरता से नहीं लेते।

सामाजिक असमर्थतायें बचपन से शुरु हो कर व्यस्क होने तक चलती हैं। ऑटिस्टिक बच्चे सामाजिक गतिविधियों के प्रति उदासीन होते है, वो लोगो की ओर ना देखते हैं, ना मुस्कुराते हैं और ज्यादातर अपना नाम पुकारे जाने पर भी सामान्य: कोई प्रतिक्रिया नहीं करते हैं। ऑटिस्टिक शिशुओं का व्यवहार तो और चौंकाने वाला होता है, वो आँख नहीं मिलाते हैं और अपनी बात कहने के लिये वो अक्सर दूसरे व्यक्ति का हाथ छूते और हिलाते हैं। तीन से पाँच साल के बच्चे आमतौर पर सामाजिक समझ नहीं प्रदर्शित करते है, बुलाने पर एकदम से प्रतिकिया नहीं देते, भावनाओं के प्रति असंवेदनशील, मूक व्यवहारी और दूसरों के साथ मुड़ जाते हैं। इसके बावजूद वो अपनी प्राथमिक देखभाल करने वाले व्यक्ति से जुडे होते है।

आत्मविमोह से ग्रसित बच्चे आम बच्चो के मुकाबले कम संलग्न सुरक्षा का प्रदर्शन करते हैं (जैसे आम बच्चे माता पिता की मौजूदगी में सुरक्षित महसूस करते हैं) यद्यपि यह लक्षण उच्च मस्तिष्क विकास वाले या जिनका ए एस डी कम होता है वाले बच्चों में गायब हो जाता है। ASD से ग्रसित बड़े बच्चे और व्यस्क चेहरों और भावनाओं को पहचानने के परीक्षण में बहुत बुरा प्रदर्शन करते हैं।

आम धारणा के विपरीत, आटिस्टिक बच्चे अकेले रहना पसंद नहीं करते। दोस्त बनाना और दोस्ती बनाए रखना आटिस्टिक बच्चे के लिये अक्सर मुश्किल साबित होता है। इनके लिये मित्रों की संख्या नहीं बल्कि दोस्ती की गुणवत्ता मायने रखती है। ASD से पीडित लोगों के गुस्से और हिंसा के बारे में काफी किस्से हैं लेकिन वैज्ञानिक अध्ययन बहुत कम हैं। यह सीमित आँकडे बताते हैं कि आत्मविमोह के शिकार मंद बुद्धि बच्चे ही अक्सर आक्रामक या उग्र होते है। डोमिनिक एट अल, ने 67 ASD से ग्रस्त बच्चों के माता-पिता का साक्षात्कार लिया और निष्कर्श निकाला कि, दो तिहाई बच्चों के जीवन में ऎसे दौर आते हैं जब उनका व्यवहार बहुत बुरा (नखरे वाला) हो जाता है जबकि एक तिहाई बच्चे आक्रामक हो जाते हैं, अक्सर भाषा को ठीक से न जानने वाले बच्चे नखरैल होते हैं।

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