Monday, July 29, 2019

दृष्टि वांधित दिव्यांग जनों के लिए कंप्यूटर प्रशिक्षण

 कम्प्यूटर प्रशिक्षण

कम्प्यूटर प्रशिक्षण हमारे पाठ्यक्रम का एक बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है क्योंकि यह अध्ययन का विषय भी है। नेत्रहीन विकलांग बच्चों को पढ़ाने के लिए हमारे पास दो तरह के कंप्यूटर लैब होने चाहिए जो नवीनतम कंप्यूटरों और सॉफ्टवेयर से लैस हो। हमारे पास जेडब्ल्यूएस, एनवीडीए और सुपर नोवा जैसे स्क्रीन पढ़ने के सॉफ्टवेयर होने चाहिए जिनकी मदद से हम अपने छात्रों को प्रशिक्षित करते हैं। हम कक्षा 2 के बाद के छात्रों को कंप्यूटर शिक्षा देने शुरू करते हैं। यह प्रशिक्षण वरिष्ठ माध्यमिक स्तर तक सही है। प्रशिक्षण बहुत ही योग्य और प्रशिक्षित कंप्यूटर प्रशिक्षकों द्वारा प्रदान किया जाता है।

आंखों से दिखाई नहीं देने के बाद भी दृष्टिबाधित दिव्यांग भी अब कंप्यूटर चला सकेंगे। सरकारी विभागों में पदस्थ दिव्यांगों को सबसे पहले कंप्यूटर चलाना सिखाया जाएगा। कलेक्टोरेट परिसर स्थित ई-दक्ष केंद्र में कंप्यूटर प्रशिक्षण दिया जाएगा। दृष्टिबाधित दिव्यांगों को कंप्यूटर सिखाने के लिए ई-दक्ष केंद्र के प्रशिक्षकों को भोपाल में विशेष ट्रेनिंग दी गई है।

श्योपुर सहित प्रदेश के सभी जिलों से प्रशिक्षकों को तीन दिन की ट्रेनिंग दी गई है। जिले से प्रशिक्षक हेमंत शर्मा को 5, 6 और 7 दिसंबर को इस संबंध में ट्रेनिंग दी गई है। भोपाल में तीन दिन की ट्रेनिंग में प्रशिक्षकों को बताया गया कि वे किस तरह दृष्टिबाधित दिव्यांगों को कंप्यूटर चलाना सिखाएंगे। एबीडीए (नॉन विजुअल डेस्कटॉप एक्सेस) सॉफ्टवेयर की मदद से दृष्टिबाधितों को प्रशिक्षण दिया जाएगा। सॉफ्टवेयर में आवाज सुनकर काम कर सकेंगे। जिले के सरकारी विभाग में कितने दृष्टिबाधित दिव्यांग पदस्थ हैं, इसकी जानकारी जुटाई जाएगी। अाने वाले दिन में दृष्टिबाधित दिव्यांग छात्रों को भी इसी तरह कंप्यूटर पर काम करना सिखाया जा सकेगा।

दृष्टिबाधित दिव्यांगों को सबसे पहले की-बोर्ड सिखाया जाएगा। की-बोर्ड में मौजूद सारी की बताई जाएंगी। की पहचान लेने के बाद दिव्यांग एनवीडीए सॉफ्टवेयर की मदद से दृष्टिबाधित दिव्यांग के लिए कंप्यूटर पर काम करना बहुत ही आसान हो जाएगा।

कंप्यूटर में सबसे पहले एनवीडीए सॉफ्टवेयर इंस्टॉल करना होगा। इसी की मदद से कंप्यूटर पर बिना देखे काम किया जा सकेगा। दृष्टिबाधित दिव्यांग गूगल पर हिंदी या अंग्रेजी दोनों ही भाषा में कुछ भी सर्च कर सकेंगे। कानों में हेड फोन की मदद से सर्च होने वाली विषय-वस्तु की आवाज सुनाई देगी। सॉफ्टवेयर में अंग्रेजी के अलावा हिंदी भाषा के लिए यूनिकोड भाषा जरूरी है। दूसरी भाषा जैसे चाणक्य, कृतिदेव व अन्य फाॅन्ट की भाषा सॉफ्टवेयर नहीं पढ़ पाएगा।

सॉफ्टवेयर ऐसे करेगा काम

कंप्यूटर में सॉफ्टवेयर ऑनलाइन डाउनलोड कर इंस्टॉल किया जाएगा। सॉफ्टेवयर में काम शुरू करते ही माउस का कर्जर जहां जाएगा, आवाज आना शुरू हो जाएगी। माई कंप्यूटर पर कर्जर पहुंचते ही आवाज सुनाई देगी। अन्य सॉफ्टवेयर या फोल्डर पर कर्जर पहुंचने पर आवाज आएगी। सिर्फ सुनकर ही कंप्यूटर चलाया जा सकेगा।


 सहायक सामग्री और सहायता-उपकरण

सहायक सामग्री एंव सहायक-उपकरण दिव्यांगजनों की गतिशीलता, संचार और उनकी दैनिक गतिविधियों में सहायता प्रदान करके उनके जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाने वाले उपकरण हैं। नि: शक्त व्यक्ति की जरूरतों को पूरा करने के लिए सहायक उपकरणों की एक विस्तृत श्रृंखला उपलब्ध है। इन सहायक उपकरणों के उपयोग से नि: शक्त व्यक्ति किसी पर आश्रित नहीं रहता और समाज में उसकी भागीदारी बढ़ती है।

सहायक सामग्री एंव सहायक-उपकरण  के कुछ उदाहरण नीचे दिए गए हैं:


  1. दैनिक जीवन के लिए सहायक उपकरणः दैनिक जीवन में इस्तेमाल किये जाने वाले यंत्रों में खाने, स्नान करने, खाना पकाने, ड्रेसिंग, टॉइलेटिंग, घर के रखरखाव आदि गतिविधियों में इस्तेमाल किये जाने वाले स्वयं सहायता यंत्रों को शामिल किया गया है। इन उपकरणों में संशोधित खाने के बर्तन, अनुकूलित किताबें, पेंसिल होल्डर, पेज टर्नर, ड्रेसिंग उपकरण और व्यक्तिगत स्वच्छता अनुकूलित उपकरण शामिल हैं।
  2. गतिशीलता उपकरण: दिव्यांगजनों को अपने आस-पास के स्थलों पर जाने के लिए सहायक उपकरण। इन उपकरणों में इलैक्ट्रिक या मैनुअल व्हीलचेयर, यात्रा के लिए वाहनों में संशोधन, स्कूटर, बैसाखी, बेंत और वॉकर शामिल हैं।
  3. घर/कार्यस्थल के लिए संशोधनः भौतिक बाधाओं को कम करने के लिए संरचनात्मक परिवर्तन जैसे - लिफ्ट रैंप, सुलभ बनाने के लिए बाथरूम में संशोधन, स्वत: दरवाजा खोलने का उपकरण और बड़े दरवाजे आदि।
  4. बैठने या खड़े होने की सुविधा के लिए उपकरण: अनुकूलित सिटिंग, तकिया, स्टैंडिंग टेबल, स्थापन बेल्ट, दिव्यांगजन की अवस्था को नियंत्रित करने के लिए ब्रेसिज़ और वैज, दैनिक कार्यों के लिए शरीर को सहायता प्रदान करने वाले उपकरणों की श्रृंखला।
  5. वैकल्पिक संचार और आगम संचार उपकरण (एएसी) - ये उपकरण  गूंगे या ऐसे दिव्यांगों की मदद करता हैं, जिनकी बातचीत करने के लिए आवाज मानक स्तर की नहीं है। इन उपकरणों में आवाज उत्पन्न करने वाले उपकरण और आवाज प्रवर्धन उपकरण शामिल हैं। नेत्रहीन व्यक्तियों के लिए, आवर्धक के रूप में उपकरण, ब्रेल या आवाज आउटपुट डिवाइस, लार्ज प्रिंट स्क्रीन और आवर्धक दस्तावेजों के लिए क्लोज सर्किट टेलीविजन आदि इस्तेमाल किए जाते हैं।
  6. प्रोस्थेटिक्स और ओर्थोटिक्स: कृत्रिम अंग या स्पलिंट्स या ब्रेसिज़ जैसे आर्थोटिक उपकरणों द्वारा शरीर के अंगों का रिप्लेसमेंट या वृद्धि। इसके अलावा मानसिक वरोध या कमी में सहायता के लिए ऑडियो टेप या पेजर (एस या अनुस्मारक के रूप में सहायता करते है) जैसे कृत्रिम उपकरण भी उपलब्ध हैं।
  7. वाहन संशोधन: अनुकूली ड्राइविंग उपकरण, हाथ द्वारा नियंत्रण, व्हीलचेयर और अन्य लिफ्ट, संशोधित वैन, या निजी परिवहन के लिए प्रयोग किए जाने वाले अन्य मोटर वाहन।
  8. दृष्टिहीन/बधिरों के लिए संवेदी उपकरण: आवर्धक, बड़े प्रिंट स्क्रीन, कान की मशीन, दृश्य सिस्टम, ब्रेल और आवाज/संचार आउटपुट उपकरण। 
  9. कंप्यूटर के उपयोग से संबंधित उपकरणः दिव्यांगजनों को कंप्यूटर का उपयोग करने में सक्षम करने के लिए हेडस्टिक, प्रकाश संकेतक, संशोधित या वैकल्पिक कीबोर्ड, दबाव से सक्रिय होने वाला स्विच, ध्वनि या आवाज से चलने वाले उपकरण, टच स्क्रीन, विशेष सॉफ्टवेयर और वाइस टू टेक्स्ट सॉफ्टवेयर। इस श्रेणी में आवाज की पहचान करने वाला सॉफ्टवेयर भी शामिल हैं।
  10. दिव्यांगजनों को सामाजिक/सांस्कृतिक कार्यक्रमों और खेलों में भाग लेने में सक्षम करने के लिए मनोरंजनात्मक उपकरणः दिव्यांगजनों को सामाजिक, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और खेलों में भाग लेने में सक्षम करने के लिए, फिल्मों के लिए ऑडियो डिवाइस, वीडियो गेम के लिए अनुकूली नियंत।
  11. नियंत्रण जैसे उपकरण।
वातावरण पर नियंत्रणः दिव्यांगजनों को विभिन्न उपकरणों को नियंत्रित करने में मदद करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियाँ, टेलीफोन के लिए स्विच, टीवी, या अन्य उपकरण जिन्हें दबाव, भौह या सांस द्वारा सक्रिय किया जा रहा हैं।
सहायक यंत्रों, उपकरणों और तकनीकों के उपयोग द्वारा दिव्यांगजनों के लिए स्वतंत्र या सहायता की संभावना का प्रदर्शन करने के लिए राष्ट्रीय न्यास द्वारा एएडीआई (राष्ट्रीय न्यास का पंजीकृत संगठन), नई दिल्ली में 'संभव' नाम से उपलब्ध सहायक उपकरणों के प्रदर्शन के लिए एक राष्ट्रीय संसाधन केंद्र की स्थापना की गई है।


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Thursday, July 25, 2019

सामाजिक गतिशीलता (Social Mobility)

 सामाजिक गतिशीलता (Social Mobility)


व्यक्तियों, परिवारों या अन्य श्रेणी के लोगों का समाज के एक वर्ग (strata) से दूसरे वर्ग में गति सामाजिक गतिशीलता कहलाती है। इस गति के परिणामस्वरूप उस समाज में उस व्यक्ति या परिवार की दूसरों के सापेक्ष सामाजिक स्थिति (स्टैटस) बदल जाता है।


परिचय

सामाजिक गतिशीलता से अभिप्राय व्यक्ति का एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचने से होता है। जब एक स्थान से व्यक्ति दूसरे स्थान को जाता है तो उसे हम साधारणतया आम बोलचाल की भाषा में गतिशील होने की क्रिया मानते हैं। परंतु इस प्रकार की गतिशीलता का कोई महत्व समाजशास्त्रीय अध्ययन में नहीं है। समाजशास्त्रीय अध्ययन में गतिशीलता से तात्पर्य एक सामाजिक व्यवस्था में एक स्थिति से दूसरे स्थिति को पा लेने से है जिसके फलस्वरूप इस स्तरीकृत सामाजिक व्यवस्था में गतिशील व्यक्ति का स्थान उँचा उठता है व नीचे चला जाता है। एक स्थान से उपर उठकर दूसरे स्थान को प्राप्त कर लेना, जो उससे उँचा है, निस्संदेह गतिशीलता है। सरल शब्दों में यह कहा जा सकता है कि समाजशास्त्र में सामाजिक गतिशीलता का अभिप्राय है किसी व्यक्ति, समूह या श्रेणी की प्रतिष्ठा में परिवर्तन।

प्रायः इस प्रकार की गतिशीलता का उल्लेख मोटे तौर पर व्यवसायिक क्षेत्र तथा समाजिक वर्ग में परिवर्तन से होता है। अक्सर सामाजिक गतिशीलता को इस समाज में मुक्त या पिछड़ेपन का द्योतक माना जाता है। सामाजिक गतिशीलता के अध्ययन में गतिशीलता की दरें, व व्यक्ति की नियुक्ति भी शामिल की जाती है। इस संदर्भ में एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी के सामाजिक संदर्भ के तहत परिवार के सदस्य का आदान-प्रदान या ऊँचा उठना व नीचे गिरना शामिल है। एस एम लिपसेट तथा आर बेंडिक्स का मानना था कि औद्योगिक समाज के स्वामित्व के लिए सामाजिक गतिशीलता आवश्यक है। जे एच गोल्ड थोर्प ने इंग्लैंड में सामाजिक गतिशीलता की चर्चा करते हुए इसके तीन महत्वपूर्ण विशेषताओं की बात की है-

(क) पिछले 50 साल में गतिशीलता के दर में ज्यादा वृद्धि हुई है।
(ख) मजदूर वर्ग की स्थिति में मध्यम तथा उच्च स्थिति में काफी परिवर्त्तन आया है।
(ग) उच्च स्थान तथा मध्यम स्तर पर गतिशीलता में ज्यादा लचीलापन देखने में आया है।


सामाजिक गतिशीलता के प्रकार

पी सोरोकिन ने सामाजिक गतिशीलता के निम्न दो प्रकार का उल्लेख किया है-

(क) क्षैतिज सामाजिक गतिशीलता (Horizontal Social Mobility)
(ख) लंबवत सामाजिक गतिशीलता (Vertical Social Mobility)
(अ) लंबवत उपरिमुखी गतिशीलता
(आ) लंबवत अधोमुखी गतिशीलता


क्षैतिज सामाजिक गतिशीलता

जब एक व्यक्ति का स्थानान्तरण एक ही स्तर पर एक समूह से दूसरे समूह में होता है तो उसे क्षैतिज सामाजिक गतिशीलता कहते है। इस प्रकार की गतिशीलता में व्यक्ति का पद वही रहता है केवल स्थान में परिवर्त्तन आता है। उदाहरण के लिए यह कहा जा सकता है कि सरकारी दफ्तरों में कई बार रूटिन तबादले होते हैं जिसमें एक शिक्षक जो एक शहर में पढ़ा रहे थे, उन्हें उस शहर से तबादला कर दूसरे शहर में भेज दिया जाता है। इसी प्रकार सेना में काम कर रहे जवान का भी एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजा जाना बिना किसी पदोन्नति के एक रूटिन तबादला है।


लंबवत सामाजिक गतिशीलता

जब किसी व्यक्ति को एक पद से उपर या नीचे की स्थिति पर काम करने के लिए कहा जाता है तो वह लंबवत सामाजिक गतिशीलता कहलाती है। उदाहरण के लिए एक शिक्षक को पदोन्नति कर उसे प्रिसिंपल बना देना तथा एक सूबेदार को सेना में तरक्की देकर उसे कैप्टेन का पद देना लंबवत सामाजिक गतिशीलता के उदाहरण हैं। लंबवत सामाजिक गतिशीलता में अगर पद में उन्नति हो cसकती है तो पद में गिरावट भी देखी जा सकती है। उदाहरण के लिए कैप्टेन के पद से हटाकर वापस एक जवान को सूबेदार बना देना भी संभव है जो लंबवत सामाजिक गतिशीलता के उदाहरण माने जा सकते हैं। लंबवत सामाजिक गतिशीलता के दो उप प्रकार हैं-U J

लंबवत उपरिमुखी गतिशीलता

इस प्रकार की गतिशीलता लंबवत सामाजिक गतिशीलता का ही उप प्रकार है जहाँ एक ही दिशा में अर्थात पदोन्नती या तरक्की की स्थिति होती है। पदोन्नति के बाद एक स्कूल शिक्षक का प्रिंसिपल बनाया जाना तथा एक सेना के जवान का सूबेदार के पद से कैप्टन बनाया जाना लंबवत उपरिमुखी गतिशीलता के उदाहरण हैं।


 लंबवत अधोमुखी गतिशीलता

यह भी एक लंबवत सामाजिक गतिशीलता का उप-प्रकार है परंतु इसमें पदोन्नति के बजाय पद में गिरावट आती है। अगर एक प्रिंसिपल को शिक्षक पद पर काम करने के लिए कहा जाय और इसी प्रकार एक सेना के जवान को कैप्टेन से हटाकर हवलदार बना दिया जाये तो ये उदाहरण हैं लंबवत अधोमुखी गतिशीलता के।

इस प्रकार सामाजिक गतिशीलता ने मुख्य रूप से इन दो प्रकारों की चर्चा की गयी है। ब्रुम तथा सेल्जनीक ने प्रतिष्ठात्मक उपागम (Reputational approach) के द्वारा दोनों वस्तुनिष्ठ तथा आत्मनिष्ठ उपागम के विभिन्न पहलुओं पर सामाजिक स्थिति में परिवर्त्तन का अध्ययन किये जाने पर बल दिया है। उनका कहना था कि बहुत से समाजशास्त्रीय अध्ययनों में भी इसका वर्णन किया गया है। एक परिवार में भी पिता और पुत्र के बीच के व्यवसाय से संबंधित दोनों के पदों में अंतर पाये जाते हैं। अगर पुत्र का व्यवसायिक पद अपने पिता के अपेक्षाकृत ऊँचा हो जाता है और कालांतर में उस पुत्र के पुत्र का भी व्यवसायिक पद अपने पिता से ऊँचा हो जाये तो इस प्रकार के पदोन्नती को वंशानुगत गतिशीलता (Generational Mobility) कहा जा सकता है। इस प्रकार व्यवसायिक क्षेत्र में जो पदों में तरक्की आती है उसका अध्ययन कर उसके जीवन-वृत्ति में गतिशीलता (Career Mobility) का समाजशास्त्रीय अध्ययन प्रतिष्ठात्मक उपागम के आधार पर किया जा सकता है। यह बताना भी आसान हो जाता है कि एक परिवार की जीवनवृत्ति में गतिशीलता की दरें तथा उसकी दिशा किस तरफ रही है।

किंग्सले डेविस ने सामाजिक गतिशीलता के अध्ययन में जाति तथा वर्ग से संबंधित पदों में परिवर्त्तन का अध्ययन किया है। उनका मानना था कि जाति और वर्ग सामाजिक गतिशीलता के अध्ययन के दो महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। जहाँ जाति में गतिशीलता नहीं होती है वहीं वर्ग में गतिशीलता पायी जाती है।

भारतीय संदर्भ में एम एन श्रीनिवास ने जाति में गतिशीलता का सांस्कृतिकरण (Sanskritisation) की अवधारणा के द्वारा विस्तार से अध्ययन किया है। उनका यह मानना था कि जाति मे सामाजिक स्थिति यों तो सभी की जन्म से निर्धारित होती है जो स्थायी होती है परंतु प्रतिष्ठात्मक उपागम के आधार पर कई निम्न जाति के लोग अपनी स्थिति को उपर उठाने के लिए कई तरीकों का इस्तेमाल करते हैं ताकि वे उच्च जाति के लोगों के समकक्ष आ सकें। इस प्रकार अपनी स्थिति को उपर उठाने की कोशिश अक्सर निम्न स्तरीय जाति के लोगों में पायी जाती है। उन्होंने यह पाया कि निम्न जाति के लोग अक्सर ऊँची जाति के लोगों के व्यवहार से तथा प्रचलित सांस्कृतिक नियमों के अनुसरण को अपनाकर अपनी स्थिति को उपर उठाना चाहते हैं। जिन जातियों में पहले उपनयन संस्कार का प्रचलन नहीं था वे इस संस्कार के द्वारा अपनी स्थिति को ऊँचा उठाना चाहते हैं। निम्न जाति के लोगों ने यह भी पाया कि उँची जाति के लोग कई धार्मिक अनुष्ठान के साथ-साथ निराभिष भोजन भी नहीं करते। निम्न जाति के लोगों ने अपने आप को उँची जाति के करीब लाने के लिए निरामिष भोजन को लाकर धार्मिक अनुष्ठानों को भी मानना शुरू कर दिया और इस प्रकार के कल्पित रूप से कर्मकांडों में बदलाव लाकर अपने आप को उँची जाति के समीप लाने का प्रयास शुरू किया। इस प्रक्रिया को एम एन श्रीनिवास ने 'संस्कृतिकरण' कहा है। परंतु कई अन्य समाजशास्त्रीयों ने यह माना है कि सांस्कृतिकरण के माध्यम से जाति के स्थान में कोई लंबवत गतिशीलता नहीं आती है बल्कि निम्न जाति को ऐसा लगता है कि उनकी प्रतिष्ठा में बदलाव आया है और संभवतः इसलिए अपनी प्रतिष्ठा में बदलाव लाने के विचार से अधिकांश निम्न जाति के लोग ही अपने व्यवहार में इस प्रकार का परिवर्त्तन लाने की कोशिश में लगे रहते हैं। निस्संदेह यह कहा जा सकता है कि सामाजिक गतिशीलता की धारणा से जाति में जो परिवर्त्तन आयें हैं उसमें शिक्षा, आय तथा पेशे में बदलाव का होना एक महत्वपूर्ण कारण है और इनका समाजशास्त्रीय अध्ययन कर सही स्थिति की पहचान करने में इस अवधारणा का योगदान काफी महत्वपूर्ण हैं।


सामाजिक गतिशीलता की परिभाषा:

i. बोगार्डस- ”सामाजिक पद में कोई भी परिवर्तन सामाजिक गतिशीलता है ।”

ii. फिचर- ”सामाजिक गतिशीलता व्यक्ति, समूह या श्रेणी के एक सामाजिक पद या स्तृत से दूसरे में गति करने को कहते हैं ।”

iii. हार्टन तथा हण्ट- ”सामाजिक गतिशीलता का तात्पर्य उच्च या निम्न सामाजिक प्रस्थितियों में गमन करना है ।”

iv. सोरोकिन- ”सामाजिक गतिशीलता से हमारा तात्पर्य सामाजिक समूहों तथा स्तरों के झुण्ड में एक सामाजिक पद से दूसरे सामाजिक पद में परिवर्तन होना है ।”

v. फेयरचाइल्ड- ”इन्होंने लोगों के एक सामाजिक समूह से दूसरे सामाजिक समूह में गमन को ही सामाजिक गतिशीलता कहा है


फिचर ने ऊर्ध्वगामी गतिशीलता के लिए निम्नांकित कारकों को उत्तरदायी माना है:

(a) अप्रवास:

अप्रवास के कारण बाहर से आने वाले व्यक्ति स्थानीय लोगों को ऊपर की ओर धकेल देते हैं । ग्रामीण लोग जब शहरों में व्यवसाय की खोज में आते हैं तो वहाँ निम्न स्थिति एवं व्यवसायों को ग्रहण कर लेते हैं । इसी प्रकार से शरणार्थी और बाहर से आने वाले लोग भी मूल निवासियों की तुलना में निम्न स्थिति को ग्रहण करने को तैयार हो जाते हैं इस प्रकार अप्रवास स्थानीय लोगों में ऊर्ध्वगामी गतिशीलता उत्पन्न करता है ।

(b) उच्च वर्ग में कम प्रजनन क्षमता:

सभी समाजों में उच्च वर्ग के लोगों की संख्या कम होती है तथा उनमें प्रजनन क्षमता भी कम होती है, इसलिए उसकी पूर्ति के लिए उनमें निम्न वर्ग के व्यक्ति समय-समय पर सम्मिलित होते रहते हैं । इससे उनकी सामाजिक स्थिति ऊँची उठ जाती है ।

(c) संघर्ष:

जब समाज में अपनी ही योग्यता एवं प्रयत्नों से बने व्यक्तियों एवं प्रतिस्पर्द्धा को महत्व दिया है तब भी ऊर्ध्वगामी गतिशीलता बढती है ।


(d) अवसर की उपलब्धि:

जब समाज में शिक्षा प्राप्त करने तथा व्यवसाय एवं कार्यों में योग्यता बढ़ने के अवसर उपलब्ध होते है तब भी लोग अपने गुणों, योग्यता और क्षमता वृद्धि करके ऊँचा उतने का प्रयास करते हैं ।

(e) समानता और विषमता के प्रतिमान:

यदि किसी समाज धर्म, प्रजाति आदि के आधार पर भेदभाव किया जाता है या आयु और लिंग के आधार पर असमानता पायी जाती है तब उसमें ऊर्ध्वगामी गतिशीलता की सम्भावना कम होती है लेकिन जब किसी समाज में निम्न वर्ग में वृद्धि होती है तो ऊर्ध्वगामी गतिशीलता की सम्भावना अधिक होती है क्योंकि यह वर्ग ऊँचा उठने के लिए संघर्ष एवं प्रतिस्पर्धा में भाग लेता है ।


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Wednesday, July 17, 2019

ऑक्यूपेशनल थेरेपी(OT)

Occupational therapy (OT)

ऑक्यूपेशनल थेरेपी के क्षेत्र में रोजगार की संभावनाएं दिन पर दिन बढ़ती जा रही हैं। आइए जानते हैं इस क्षेत्र के बारे में-
बदलती जीवनशैली और काम के सिलसिले में भागम भाग के चलते लोगों के स्वास्थ्य पर कई तरह के प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहे हैं, जिनमें शारीरिक व मानसिक अशक्तता प्रमुखता से शामिल हैं। इनसे निजात पाने के लिए उन्हें एक्सपर्ट की मदद लेनी पड़ रही है। संबंधित एक्सपर्ट विभिन्न विधियों से इलाज करते हुए उन्हें समस्या से मुक्ति दिलाते हैं। साथ ही उन्हें मानसिक रूप से भी मजबूत बनाते हैं। कई बार डॉंक्टर के देख लेने के बाद इनकी जरूरत पड़ती है तो कुछ मामले ऐसे भी हैं, जिनमें डॉंक्टर के देखने से पहले ही इनकी सेवा ली जाती है। खासकर मेडिकल और ट्रॉमा सेंटर इमरजेंसी व फ्रैक्चर मैनेजमेंट में तो इनकी विशेष जरूरत पड़ती है। यह पूरा ताना-बाना ऑक्यूपेशनल थेरेपी के अंतर्गत बुना जाता है। इससे जुड़े प्रोफेशनल्स को ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट नाम दिया गया है। इनका काम फिजियोथेरेपिस्ट से मिलता-जुलता है। यही कारण है कि मेडिकल व फिटनेस एरिया में इनकी भारी मांग है।

ऑक्यूपेशनल थेरेपी की जरूरत

ऑक्यूपेशनल थेरेपी का सीधा संबंध पैरामेडिकल से है। इसके अंतर्गत शारीरिक व विशेष मरीजों की अशक्तता का इलाज किया जाता है, जिसमें न्यूरोलॉजिकल डिसॉर्डर, स्पाइनल कॉर्ड इंजरी के उपचार से लेकर अन्य कई तरह के शारीरिक व्यायाम कराए जाते हैं। कई बार मानसिक विकार आ जाने पर कागज-पेंसिल के सहारे मरीजों को समझाया जाता है। ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट मरीजों का पूरा रिकॉर्ड अपने पास रखते हैं। इसमें हर आयु-वर्ग के मरीज होते हैं। यह सबसे तेजी से उभरते मेडिसिन के क्षेत्रों में से एक है। इसमें शारीरिक व्यायाम अथवा उपकरणों के जरिए कई जटिल रोगों का इलाज किया जाता है। शारीरिक रूप से अशक्त होने या खिलाडियों में आर्थराइटिस व न्यूरोलॉजिकल डिसॉर्डर आने पर ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट की मदद ली जाती है। यही कारण है कि प्रोफेशनल्स को ह्यूमन एनाटमी, हड्डियों की संरचना, मसल्स एवं नर्वस सिस्टम आदि की जानकारी रखनी पड़ती है।

 बारहवीं के बाद मिलेगा दाखिला

ऑक्यूपेशनल थेरेपी से संबंधित बैचलर, मास्टर और डिप्लोमा और डॉक्टरल कोर्स मौजूद हैं। यदि छात्र बैचलर कोर्स में प्रवेश लेना चाहता है तो उसका फिजिक्स, केमिस्ट्री व बायोलॉजी ग्रुप के साथ बारहवीं की परीक्षा उत्तीर्ण होना  जरूरी है। बैचलर के बाद मास्टर और डॉंक्टरल प्रोग्राम में दाखिला मिल सकता है। कोर्स के बाद छह माह की इंटर्नशिप की व्यवस्था है। कई संस्थान अपने यहां प्रवेश देने के लिए प्रवेश परीक्षा का आयोजन कराते हैं, जिसमें सफल होने के बाद विभिन्न कोर्सों में दाखिला मिलता है, जबकि कई संस्थान मेरिट के आधार पर प्रवेश देते हैं।

कौन-कौन से हैं कोर्स

बीएससी इन ऑक्यूपेशनल थेरेपी (ऑनर्स)
बीएससी इन ऑक्यूपेशनल थेरेपी
बैचलर ऑफ ऑक्यूपेशनल थेरेपी
डिप्लोमा इन ऑक्यूपेशनल थेरेपी
एमएससी इन फिजिकल एंड ऑक्यूपेशनल थेरेपी
मास्टर ऑफ ऑक्यूपेशनल थेरेपी

कोर्स से जुड़ी जानकारी

इसमें छात्रों को थ्योरी व प्रैक्टिकल पर समान रूप से अपना फोकस रखना पड़ता है। कोर्स के दौरान ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट को कई क्लिनिकल व पैरा क्लिनिकल विषयों का अध्ययन करना होता है। इसमें मुख्य रूप से एनाटमी, फिजियोलॉजी, पैथोलॉजी, माइक्रोबायोलॉजी, बायोकेमिस्ट्री, मेडिसिन एवं सर्जरी (मुख्यत: डायग्नोस्टिक) आदि विषय शामिल हैं। इसके अलावा इन्हें ऑर्थपीडिक्स, प्लास्टिक सर्जरी, हैंड सर्जरी, रिमैटोलॉजी, साइकाइट्री आदि के बारे में भी थोड़ी-बहुत जानकारी दी जाती है।

 आवश्यक स्किल्स

यह एक ऐसा प्रोफेशन है, जिसमें छात्रों को संवेदनशील होने से लेकर वैज्ञानिक नजरिया तक अपनाना पड़ता है, क्योंकि इसमें उन्हें मरीजों के दुख को समझ कर उसके हिसाब से उपचार करने की जरूरत होती है। अच्छी कम्युनिकेशन स्किल, टीम वर्क, मेहनती, रिस्क उठाने और दबाव को झेलने जैसे गुण इस प्रोफेशन के लिए बहुत जरूरी हैं। अधिकांश काम मेडिकल उपकरणों के सहारे होता है, इसके लिए उनका ज्ञान बहुत जरूरी है।

सेलरी

ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट को काफी आकर्षक सेलरी मिलती है। कोर्स समाप्ति के बाद उन्हें शुरुआती दौर में 15-20 हजार रुपए प्रतिमाह आसानी से मिल जाते हैं, जबकि दो-तीन साल के अनुभव के बाद यह राशि 30-35 हजार रुपए तक पहुंच जाती है। प्राइवेट सेक्टर में सरकारी अस्पतालों की अपेक्षा ज्यादा सेलरी मिलती है। यदि ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट स्वतंत्र रूप से या अपना सेंटर खोल कर काम कर रहे हैं तो उनके लिए आमदनी की कोई निश्चित सीमा नहीं होती। वे 50 हजार से लेकर एक लाख रुपए प्रतिमाह तक कमा सकते हैं।

 रोजगार के पर्याप्त अवसर

रोजगार की दृष्टि से यह काफी विस्तृत क्षेत्र है। यदि छात्र ने गंभीरतापूर्वक कोर्स किया है तो रोजगार के लिए भटकना नहीं पड़ेगा। उसे सरकारी अथवा प्राइवेट अस्पताल में नौकरी मिल जाएगी। सबसे ज्यादा जॉब कम्युनिटी मेडिकल हेल्थ सेंटर, डिटेंशन सेंटर, हॉस्पिटल, पॉलीक्लिनिक, साइक्राइटिक इंस्टीटय़ूशन, रिहैबिलिटेशन सेंटर, स्पेशल स्कूल, स्पोर्ट्स टीम में सृजित होती हैं। एनजीओ भी इसके लिए एक अच्छा विकल्प साबित हो सकते हैं। इसमें एक-तिहाई थेरेपिस्ट पार्ट टाइम को तरजीह देते हैं। यदि वे किसी सेंटर अथवा संस्था से जुड़ कर काम नहीं करना चाहते तो स्वतंत्र रूप से काम करने के अलावा अपना सेंटर भी खोल सकते हैं।

फायदे एवं नुकसान
सेवा व समर्पण की भावना
हर दिन कुछ नया सीखने का अवसर
काम के बाद आत्मसंतुष्टि
घंटों काम करने से थकान की स्थिति
अपेक्षित सफलता न मिलने पर कष्ट
अपने काम के लिए नेटवर्किंग जरूरी

एक्सपर्ट व्यू
चुनौतियों के लिए तैयार रहना होगा छात्रों को

अन्य क्षेत्रों की भांति मेडिकल क्षेत्र भी तेजी से दौड़ रहा है। उसमें कदम-कदम पर रोजगार के अवसर भी सामने आ रहे हैं। कमोबेश यही स्थिति ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट के साथ है। आज युवाओं के लिए यह पसंदीदा क्षेत्र बन चुका है और हर साल इसमें छात्रों की भीड़ बढ़ती जा रही है। भले ही इस क्षेत्र में ढेरों विकल्प हैं, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं। कोर्स खत्म होने के बाद नौकरी तलाशने से लेकर अपनी यूनिट स्थापित करने तक में छात्रों की खुद की मेहनत रंग लाती है, इसलिए छात्र अपनी मंजिल खुद तय करें तो फायदेमंद होगा। इसमें थ्योरी व प्रैक्टिकल दोनों की समान जानकारी दी जाती है, क्योंकि दोनों का अपना महत्व है। जो चीजें क्लास में पढ़ाई जाती हैं, लैब में उन्हीं का प्रैक्टिकल कराया जाता है। इस पेशे से संबंधित तकनीक व उपकरण दिन-प्रतिदिन बदलते जा रहे हैं। बाजार में बने रहने के लिए छात्रों को उन नई तकनीकों व आधुनिक उपकरणों से अपडेट रहना होगा।     

- डॉ. वीपी सिंह (डायरेक्टर)
दिल्ली इंस्टीट्यूट ऑफ पैरामेडिकल साइंस, दिल्ली के अनुसार -

इन पदों पर मिलेगा काम
ऑक्यूपेशनल थेरेपी टेक्निशियन
कंसल्टेंट
ऑक्यूपेशनल थेरेपी नर्स
रिहैबिलिटेशन थेरेपी
असिस्टेंट
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